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    अमेरिका के न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर पर टॉयलेट की दिक्कत:45 मिनट तक लाइन में लग रहे सैनिक; डिजाइन में खामी के चलते टॉयलेट जाम

    10 hours ago

    ईरान की तरफ बढ़ रहा अमेरिकी न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर USS जेराल्ड फोर्ड एक अलग ही संकट से जूझ रहा है। जहाज के ज्यादातर टॉयलेट बंद हो चुके हैं। इससे 4,500 से ज्यादा नौसैनिकों को रोज 45 मिनट तक लाइन में लगना पड़ रहा है। संकरी पाइपलाइन और वैक्यूम-बेस्ड सिस्टम की डिजाइन में खामी के चलते टॉयलेट बार-बार जाम हो रहे हैं। जहाज वैक्यूम-बेस्ड सीवेज सिस्टम पर चलता है, जिसमें एक वाल्व खराब होने से पूरे डिपार्टमेंट का टॉयलेट सिस्टम बंद हो जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेक्नीशियन और सैनिकों के बीच झड़प की भी खबर है, क्योंकि मरम्मत करने वाले इंजीनियर रोज लगभग 19 घंटे काम कर रहे हैं। पिछले साल मार्च में भी चार दिन में 205 टॉयलेट खराब होने की शिकायत सामने आई थी। एयरक्राफ्ट पर 600 से ज्यादा टॉयलेट मौजूद USS जेराल्ड फोर्ड 600 से ज्यादा मौजूद है, जो 10 अलग-अलग जोन में बंटे हैं। यह एयरक्राफ्ट बीते आठ महीने से समुद्र में है, लगातार ऑपरेशनल मूवमेंट की वजह से रूटीन मेंटेनेंस नहीं हो पाया है। करीब 13 बिलियन डॉलर की लागत से बना यह युद्धपोत दुनिया का सबसे महंगा माना जाता है। इस एयरक्राफ्ट कैरियर को 2017 में कमीशन किया गया था। क्या है मुसीबत की वजह बना वैक्यूम-बेस्ड सिस्टम? सीवेज समस्या के पीछे जिस तकनीक का जिक्र हो रहा है, उसे वैक्यूम-बेस्ड VCHT सिस्टम कहा जाता है। यह आम घरों में इस्तेमाल होने वाले टॉयलेट सिस्टम से बिल्कुल अलग तरीके से काम करता है। VCHT का पूरा नाम वैक्यूम कलेक्शन, होल्डिंग एंड ट्रांसफर सिस्टम है। यह खास तरह का सीवेज मैनेजमेंट सिस्टम होता है, जो बड़े जहाजों और क्रूज शिप में लगाया जाता है। इसका मकसद कम पानी में टॉयलेट वेस्ट को इकट्ठा करना और सुरक्षित तरीके से स्टोर व ट्रांसफर करना होता है। कैसे काम करता है? घर के टॉयलेट में फ्लश करने पर पानी के दबाव और गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) से गंदगी नीचे सीवर में चली जाती है। लेकिन समुद्र में चलने वाले जहाजों पर ऐसा सिस्टम पूरी तरह कारगर नहीं होता VCHT सिस्टम में फ्लश दबाते ही पाइप में वैक्यूम (सक्शन) बनता है। यह सक्शन गंदगी को खींचकर पाइप के जरिए एक बड़े टैंक तक पहुंचा देता है। बाद में उस वेस्ट को प्रोसेस या डिस्पोज किया जाता है। इसे ऐसे समझें जैसे वैक्यूम क्लीनर धूल को खींच लेता है। यहां भी वही तकनीक टॉयलेट सिस्टम में लागू होती है। जहाजों में यह सिस्टम क्यों जरूरी? विमानवाहक पोत पर 4,000 से ज्यादा लोग महीनों तक समुद्र में रहते हैं। ऐसे में पानी सीमित होता है, जगह कम होती है। साथ ही पाइपलाइन सीधी नहीं, कई दिशा में जाती है। इसलिए कम पानी में काम करने वाला और लचीला सिस्टम लगाया जाता है। VCHT सिस्टम कम पानी में फ्लश कर देता है, जिससे पानी की बचत होती है। 2025 से समुद्र में तैनात है जेराल्ड आर. फोर्ड जेराल्ड आर. फोर्ड पिछले साल जून से लगातार समुद्र में तैनात है। आमतौर पर एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती नौ महीने की होती है, लेकिन सैन्य गतिविधि बढ़ने पर इसे बढ़ाया भी जाता है। फोर्ड परमाणु रिएक्टर से संचालित है और इसमें 75 से ज्यादा सैन्य विमान तैनात किए जा सकते हैं। इनमें एफ-18 सुपर हॉर्नेट फाइटर जेट और ई-2 हॉकआई जैसे अर्ली वार्निंग विमान शामिल हैं। इसमें अत्याधुनिक रडार सिस्टम भी लगा है, जो हवाई यातायात और नेविगेशन को नियंत्रित करने में मदद करता है। अमेरिका-ईरान में लगातार तनाव बढ़ रहा है अमेरिका और ईरान के बीच लगातार तनाव बढ़ रहा है। अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में 2003 के इराक युद्ध के बाद अपनी सबसे बड़ी एयर फोर्स तैनात की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में F-35, F-22, F-15 और F-16 जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स की कई स्क्वॉड्रन तैनात की हैं। बड़े पैमाने पर एयर ऑपरेशन के लिए जरूरी कमांड एंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट भी भेजे जा रहे हैं। हाल के हफ्तों में एयर डिफेंस सिस्टम भी इलाके में लगाए गए हैं अमेरिकी न्यूज एजेंसी एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है तो यह कई हफ्तों तक चलने वाला बड़ा ऑपरेशन होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह ऑपरेशन पिछले महीने वेनेजुएला में हुई सीमित कार्रवाई से कहीं बड़ा होगा और संभव है कि इसे इजराइल के साथ मिलकर अंजाम दिया जाए। इसका निशाना ईरान का परमाणु और मिसाइल ढांचा हो सकता है। अरब सागर में USS अब्राहम लिंकन पहले से तैनात अमेरिकी जंगी जहाज USS अब्राहम लिंकन पहले से अरब सागर में तैनात है। ईरान के कई शहर इसकी स्ट्राइक रेंज में हैं। USS अब्राहम लिंकन पहले साउथ चाइना सी में तैनात था। 18 जनवरी को यह मलक्का स्ट्रेट पार कर हिंद महासागर में दाखिल हुआ। इसके अलावा अमेरिका ने USS थियोडोर रूजवेल्ट और कई मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत तैनात किए हैं। अमेरिका अब ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य अड्डों व कमांड सेंटरों पर समुद्र और आसमान दोनों से हमले की स्थिति में आ गया है।
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