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    अमेरिका ने ईरान पर 850 टॉमहॉक मिसाइलें दागीं:2 साल में बनता है 34 करोड़ का यह हथियार, जंग खिंची तो स्टॉक खत्म होने की आशंका

    21 hours ago

    ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसे अमेरिकी हथियारों के जखीरे का अहम हथियार माना जाता है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक चार हफ्तों में 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गईं। अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के पास लगभग 4,000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं। अगर यह सही है तो टॉमहॉक मिसाइलों का करीब एक चौथाई हिस्सा खत्म हो चुका है। रक्षा मंत्रालय के भीतर इसको लेकर चिंता बढ़ गई है। करीब 34 करोड़ रुपए की टॉमहॉक बनाने में करीब 2 साल लग सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार इस कमी पूरी करने में कई साल लगेंगे। अमेरिका के पास करीब 4000 टॉमहॉक मिसाइलें टॉमहॉक अमेरिका की खास क्रूज मिसाइल है। यह 1,000 मील (1609 किमी) तक उड़कर 1,000 पाउंड (453 किलो) विस्फोटक सटीक निशाने पर गिरा सकती है। इसके एडवांस वर्जन की रेंज 2500 किमी है। टॉमहॉक का बड़े पैमाने पर पहला इस्तेमाल 1991 के खाड़ी युद्ध में हुआ। अमेरिका ने इराक पर दूर से सैकड़ों मिसाइलें दागीं। इसे रिमोट वार कहा गया, क्योंकि पहली बार इतनी सटीक और लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें इस्तेमाल हुईं। टॉमहॉक को समुद्र में मौजूद युद्धपोतों और पनडुब्बियों से भी दागा जा सकता है, जिससे दुश्मन के इलाके में घुसे बिना हमला संभव हो जाता है। अमेरिका बीते एक महीने से ईरान पर हमले कर रहा है। यह पूरी तरह ‘स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक’ है। यानी हमला इतनी दूर से किया गया कि अमेरिकी सैनिकों को जमीन पर उतरने की जरूरत नहीं पड़ रही है। एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक अमेरिका के पास फिलहाल 4000 के करीब टॉमहॉक मिसाइलें हैं। यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया में बढ़ते खतरों के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को टॉमहॉक मिसाइलों की बहुत जरूरत है। अगर युद्ध लंबा चला, तो अमेरिका के पास अपने उपयोग के लिए भी टॉमहॉक खत्म हो सकते हैं, सहयोगियों को देना मुश्किल होगा। एक साल में 600 टॉमहॉक मिसाइल बनाता है अमेरिका अमेरिका टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का उत्पादन बहुत सीमित मात्रा में करता है। मौजूदा क्षमता के मुताबिक एक साल में करीब 600 टॉमहॉक मिसाइलें बनाई जा सकती हैं। एक टॉमहॉक की लागत करीब 36 लाख डॉलर (34 करोड़ रुपए) है, जिससे तेज इस्तेमाल ने सप्लाई पर दबाव बढ़ाया है। समस्या यह है कि एक टॉमहॉक बनने में लगभग 2 साल लगते हैं, इसलिए ऑर्डर के बाद तुरंत उपलब्ध नहीं होती। यही वजह है कि जब युद्ध में इनका तेजी से इस्तेमाल होता है, जैसे अभी ईरान संघर्ष में हुआ, तो स्टॉक जल्दी घट जाता है और उसे भरने में कई साल लग सकते हैं। जापान के साथ मिसाइल बनाने की डील अटकी 2024 में टॉमहॉक की कमी का समाधान दिखा, जब अमेरिका जापान में जॉइंट प्रोडक्शन के करीब पहुंचा, जिससे उत्पादन दोगुना हो सकता था। प्लान यह था कि जापान, अमेरिका के लिए टॉमहॉक मिसाइल के कुछ हिस्से का उत्पादन करे। इसका फायदा दोनों देशों को मिलता। जापान अपनी रक्षा नीति में बदलाव कर रहा है और लंबी दूरी की स्ट्राइक क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। यही वजह है कि उसने मिसाइल बनाने में मदद करने की हामी भरी। हालांकि अमेरिका ने इस साझेदारी के लिए कई सख्त शर्तें रखी थीं। जैसे कि हालांकि अमेरिका के अंदर ही इस डील का विरोध शुरू हो गया। दोनों ही पार्टी में कई नेताओं और विशेषज्ञों को डर था कि एडवांस्ड मिसाइल टेक्नोलॉजी विदेश में शेयर करना जोखिम भरा हो सकता है। टोमहॉक बनाने वाली कंपनी RTX के एक सीनियर अधिकारी ने भी इस विरोध में साथ दिया। यह भी चिंता थी कि इससे अमेरिका की रक्षा इंडस्ट्री को नुकसान होगा और देश की इकोनॉमी पर भी असर पडे़गा। इस वजह से यह योजना पूरी तरह लागू नहीं हो पाई और मामला अटका गया। अमेरिका से 6 गुना तेज हथियार बना रहा चीन न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक यह मामला अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की बड़ी समस्या दिखाता है। वह अकेले चीन की बढ़ती औद्योगिक क्षमता का मुकाबला नहीं कर पा रहा, जो अब सैन्य शक्ति में बदल रही है। चीन वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग का 28% और अमेरिका 17% हिस्सेदारी रखता है। अनुमान है कि चीन 5-6 गुना तेजी से एडवांस हथियार हासिल कर रहा है। चीन का एक शिपयार्ड अमेरिका के सभी शिपयार्ड्स से ज्यादा जहाज बना सकता है। अमेरिका को चीन से पिछड़ने का खतरा अब अमेरिका को यह खतरा है कि वह इतिहास में ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की तरह किसी उभरती औद्योगिक ताकत से सैन्य रूप से पिछड़ जाए। इतिहास बताता है कि ऐसी प्रतिस्पर्धाओं अक्सर विनाशकारी युद्धों में खत्म होती हैं। समाधान यह है कि अमेरिका अकेले नहीं, बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर चीन का मुकाबला करे। काफी समय तक कई सहयोगी देश अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ते रहे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे ‘फ्री राइडिंग’ कहा था। ये देश अपनी अर्थव्यवस्था का बहुत छोटा हिस्सा रक्षा पर खर्च करते थे और अमेरिका पर निर्भर रहते थे। ट्रम्प अक्सर फ्री राइडर्स के खिलाफ सख्ती का श्रेय लेते हैं। पिछले 60 सालों में अमेरिका ने अपनी जीडीपी का 3 से 9.4 प्रतिशत तक रक्षा पर खर्च किया है, जबकि कई सहयोगी देशों का खर्च 1 प्रतिशत से भी कम रहा है। अब एशिया में चीन की बढ़ती आक्रामकता और यूरोप में रूस की जंगबाजी को देखते हुए यह व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रही। अब अमेरिका को दुनिया में अपनी भूमिका और गठबंधनों को नए सिरे से सोचना होगा, क्योंकि अब वह अकेला सबसे ताकतवर देश नहीं रहा। ----------------------------------------- ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के लिए होर्मुज स्ट्रेट खुलवाना मुश्किल क्यों:ईरान संकरे रास्ते का फायदा उठा रहा, यहां अमेरिकी वॉरशिप भी सुरक्षित नहीं ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहा युद्ध अब इतना बढ़ गया है कि होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद हो गया है। इस वजह से सैकड़ों तेल टैंकर दोनों तरफ खड़े हैं और आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इससे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुकी हैं। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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