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    मीडिया को दबाने में सरकारें कर रहीं ताकतों का इस्तेमाल:50 फीसदी से ज्यादा देशों में प्रेस की आजादी खतरे में,‎ अमेरिका ने स्वतंत्र विदेशी मीडिया की सब्सिडी‎ रोकी

    3 weeks ago

    नवंबर 2024 में सर्बिया के एक रेलवे स्टेशन की ‎‎कैनोपी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई। इस‎ घटना पर स्वतंत्र पत्रकारों ने रिपोर्टिंग की, लेकिन‎ कुछ पत्रकारों को गुंडों ने पीटा, पुलिस खड़ी होकर ‎‎देखती रही। सर्बिया के स्वतंत्र पत्रकार संघ के‎ अनुसार 2025 में वहां पत्रकारों पर 91 शारीरिक‎ हमले हुए। हमलावरों को सजा भी नहीं मिलती है।‎ सर्बिया ही नहीं, दुनियाभर में मीडिया की आजादी ‎घट रही है। रिपोटर्स विदआउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में प्रेस की स्वतंत्रता का वैश्विक औसत स्कोर 2025‎ में 55 से नीचे आ गया। 2014 में ये 100 में 67 ‎पर था। दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में पत्रकारिता ‎‎करने की स्थितियां कठिन या बहुत गंभीर हैं।‎ प्रेस फ्रीडम की इस गिरावट को गंभीरता से देखा ‎‎जाना चाहिए, क्योंकि आलोचनात्मक पत्रकारिता ‎‎(क्रिटिकल जर्नलिज्म) सत्ताधीशों की मनमानी पर ‎‎नियंत्रण है। अगर ताकतवर लोगों को पता हो कि ‎‎उनके गलत काम न तो उजागर होंगे और न ही ‎‎प्रचारित, तो वे और ज्यादा करेंगे।‎ अमेरिकी सरकार पहले दुनियाभर में प्रेस की स्वतंत्रता ‎के लिए खड़ी होती थी। वह अब ऐसा नहीं करती। ट्रम्प ‎प्रशासन ने स्वतंत्र विदेशी मीडिया को दी जाने वाली सब्सिडी खत्म कर दी है। रेडियो फ्री एशिया जैसे ‎सार्वजनिक आउटलेट्स बंद कर दिए हैं। ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि वे सरकारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‎को लेकर दबाव नहीं डालेंगे, जब तक वे वोक यूरोपीय‎न हों। अजरबैजान से एल साल्वाडोर तक मजबूत ‎शासकों ने परेशान करने वाले पत्रकारों को जेल में‎ डालने, डराने का मौका पकड़ लिया है, ‎क्योंकि ‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎राजनयिक प्रतिक्रिया का डर नहीं रहा।‎ इकोनॉमिस्ट के 180 देशों के डेटा के विश्लेषण ‎के‎ मुताबिक मीडिया को दबाने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा‎ देने के बीच संबंध है। जनता को लूटने वाले राजनेता‎ प्रेस को दबाते हैं, ताकि चोरी करना आसान हो जाए।‎ विश्लेषण बताता है कि किसी देश में प्रेस की आजादी‎ बहुत अच्छी स्थिति से गिरकर खराब स्थिति में आ‎जाए, तो वह ज्यादा भ्रष्ट बन सकता है। यह प्रक्रिया कई ‎वर्षों में बढ़ती है, इसे मतदाता अगला चुनाव होने के बाद‎ ही नोटिस कर पाते हैं। लोकलुभावन सरकारों में स्थिति ‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎और भी बदतर होती है। वे उन संस्थाओं को कुचलने की ‎कोशिश करती हैं, जो उनके अधिकार सीमित करती हैं।‎ लोकतांत्रिक सरकारें पत्रकारिता को दबाने के लिए‎ तीन तरह के हमले करती हैं- पहला, शाब्दिक हमला ‎जिसमें पत्रकारों को देशद्रोही बताया जाता है। दूसरा,‎ कानूनी, जिसमें मुकदमे, टैक्स रेड, गिरफ्तारी होती है।‎ तीसरा, आर्थिक हमला जिसमें विज्ञापन और फंड‎ रोककर मीडिया को कमजोर किया जाता है। बड़ी गिरावट लोकतांत्रि​क देशों में आ रही‎ मीडिया की आजादी में बड़ी गिरावट लोकतांत्रिक देशों में आ रही है क्योंकि ‎तानाशाही देशों में तो स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो गई है। लोकतांत्रिक ‎सरकारें आलोचना को पूरी तरह खत्म करने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि वे‎ खबर जुटाने वालों के लिए प्रोत्साहनों को इस तरह बिगाड़ देती हैं कि आम ‎लोगों को सत्तारूढ़ पार्टी की भरपूर तारीफ सुनाई दे और असहमति की‎ आवाज सिर्फ कभी-कभार की चीख जैसी रह जाए। मकसद है ताकतवरों को‎ सत्ता में बनाए रखना और उनके दुरुपयोग की निगरानी कम करना।‎‎ महिला पत्रकारों पर भी हमले‎ जो लोग ताकतवरों को परेशान करते हैं, उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक की जाती है, खासकर अगर वे‎ महिलाएं हों। संयुक्त राष्ट्र के सर्वे में पाया गया कि 75% महिला रिपोर्टरों ने ऑनलाइन दुर्व्यवहार झेला‎ और 42% को व्यक्तिगत रूप से परेशान किया गया‎ या धमकी दी गई।‎ तुर्किये से तंजानिया तक में असर‎ सितंबर में तुर्किये सरकार ने कैन होल्डिंग नामक‎मीडिया समूह पर नियंत्रण कर लिया। तंजानिया में‎ धांधली वाले चुनाव को कवर करने पर पत्रकारों को‎ देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वहीं‎ इंडोनेशिया में पत्रकारिता की गुणवत्ता पिछले पांच या‎ छह वर्षों में आर्थिक दबाव के कारण गिर गई है।‎ ‎
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